स्ट्रोक में हर सेकंड अनमोल, समय पर इलाज से बच सकती है जान और स्थायी विकलांगता : विशेषज्ञ
लखनऊ, 11 जुलाई। स्ट्रोक एक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें उपचार में हुई थोड़ी-सी देरी भी मरीज की जान और उसके सामान्य जीवन पर भारी पड़ सकती है। भारत में प्रतिवर्ष लगभग 18 से 20 लाख लोग स्ट्रोक का शिकार होते हैं। समय पर पहचान, त्वरित जांच और शीघ्र उपचार से न केवल मृत्यु दर को कम किया जा सकता है, बल्कि स्थायी विकलांगता से भी बचाव संभव है। यह बातें मेदांता हॉस्पिटल में आयोजित स्ट्रोक जागरूकता कार्यक्रम में विशेषज्ञ चिकित्सकों ने कहीं।

कार्यक्रम में न्यूरोलॉजी एवं न्यूरोसर्जरी विभाग के वरिष्ठ विशेषज्ञों ने स्ट्रोक की पहचान, आधुनिक उपचार, बचाव और पुनर्वास की आवश्यकता पर विस्तार से जानकारी दी। इस अवसर पर डॉ. रवि शंकर (डायरेक्टर, न्यूरोसर्जरी), डॉ. रतीश जुयाल (डायरेक्टर, न्यूरोलॉजी), डॉ. कमलेश सिंह भैसोरा (डायरेक्टर, न्यूरोसर्जरी) तथा डॉ. रोहित अग्रवाल (डायरेक्टर, इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी) उपस्थित रहे।
मेदांता के डायरेक्टर न्यूरोलॉजी डॉ. अनूप कुमार ठक्कर ने कहा कि स्ट्रोक के उपचार में “टाइम इज़ ब्रेन” की अवधारणा सबसे महत्वपूर्ण है। यदि किसी व्यक्ति का चेहरा अचानक टेढ़ा हो जाए, हाथ या पैर में कमजोरी महसूस हो या बोलने में परेशानी आने लगे, तो इसे बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उन्होंने लोगों से BE FAST के चेतावनी संकेतों को समझने और लक्षण दिखाई देते ही तत्काल अस्पताल पहुंचने की अपील की।
उन्होंने बताया कि स्ट्रोक के इलाज के लिए शुरुआती साढ़े चार घंटे (4.5 घंटे) सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान आईवी थ्रोम्बोलाइसिस के माध्यम से मरीज में स्थायी विकलांगता का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि मेदांता लखनऊ में चयनित मरीजों का आधुनिक चिकित्सा पद्धति के तहत 24 घंटे तक भी उपचार संभव है।
डॉ. ठक्कर ने कहा कि प्रत्येक जिला अस्पताल में सीटी स्कैन, ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर जांच जैसी बुनियादी सुविधाओं के साथ आईवी थ्रोम्बोलाइसिस की व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिए। गंभीर मरीजों को “ड्रिप एंड शिप” मॉडल के तहत तत्काल उच्च स्तरीय चिकित्सा संस्थानों में रेफर किया जाना चाहिए, ताकि उनका समय पर बेहतर उपचार हो सके।

मेदांता के मेडिकल डायरेक्टर एवं डायरेक्टर, यूरोलॉजी एंड किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी डॉ. राकेश कपूर ने कहा कि स्ट्रोक ऐसी मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें हर सेकंड की कीमत होती है। समय पर इलाज मिलने से मरीज की जान बचाने के साथ-साथ उसे स्थायी विकलांगता से भी बचाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जागरूकता, स्वस्थ जीवनशैली और तत्काल चिकित्सा सहायता ही स्ट्रोक से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है।
विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि स्ट्रोक से उबरने वाले मरीजों के लिए पुनर्वास (रीहैबिलिटेशन) उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े विशेष पुनर्वास केंद्रों का विस्तार किया जाना चाहिए, ताकि मरीज दोबारा सामान्य जीवन जी सकें। उन्होंने आईआईटी कानपुर जैसे तकनीकी संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों के सहयोग से नई तकनीकों के विकास एवं उपयोग पर भी बल दिया।
विशेषज्ञों के अनुसार उच्च रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान और मोटापा स्ट्रोक के प्रमुख जोखिम कारक हैं। इनकी समय पर पहचान और प्रभावी नियंत्रण से स्ट्रोक के मामलों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। उन्होंने बताया कि कई विकसित देशों में केवल उच्च रक्तचाप पर नियंत्रण कर स्ट्रोक के मामलों में लगभग 45 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है।
कार्यक्रम के अंत में चिकित्सकों ने “हर जीवन की रक्षा, हर सेकंड की कीमत” का संदेश देते हुए लोगों से अपील की कि स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही बिना समय गंवाए मरीज को तत्काल अस्पताल पहुंचाएं, क्योंकि समय पर मिला उपचार ही जीवन बचाने और विकलांगता रोकने का सबसे प्रभावी माध्यम है।



