ईरान में सत्ता बनाम जनता: धार्मिक शासन, आर्थिक तबाही और सड़कों पर उठता जनाक्रोश
ईरान इन दिनों अभूतपूर्व जनाक्रोश का सामना कर रहा है। सड़कों पर उतरी जनता सरकार के खिलाफ खुला विरोध दर्ज करा रही है। हालात को समझने के लिए यदि भारत में एक काल्पनिक स्थिति की कल्पना करें—जहाँ धार्मिक उन्माद चरम पर हो, सत्ता के शीर्ष पर एक धर्मगुरु बैठा हो, और उसी विचारधारा के लोग प्रदेशों से लेकर प्रशासनिक तंत्र तक काबिज हों—तो तस्वीर कुछ हद तक स्पष्ट होती है। धार्मिक नारों और प्रतीकों के बीच आम जनता गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, दवा और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए जूझ रही हो; पड़ोसी देशों और वैश्विक शक्तियों से रिश्ते बिगड़े हों; और अर्थव्यवस्था चरमराकर ठप हो चुकी हो—ऐसी स्थिति में जनाक्रोश स्वाभाविक है।
ईरान में शिया धर्मगुरु अयातुल्ला खुमैनी की वैचारिक विरासत के तहत धार्मिक नेतृत्व का शासन लंबे समय से स्थापित है। सत्ता के अहम पदों पर मौलवियों की नियुक्ति और सुरक्षा तंत्र में कड़ा नियंत्रण इस व्यवस्था की पहचान रही है। लेकिन जब देश आर्थिक बर्बादी, अंतरराष्ट्रीय अलगाव और सामाजिक असंतोष से जूझता है, तब जनता का धैर्य टूटता है। विरोध प्रदर्शनों को ‘धर्म-विरोधी’ या ‘देश-विरोधी’ बताकर दबाने की कोशिशें भी सामने आई हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तेहरान के केवल छह अस्पतालों में 217 लोगों के मारे जाने की सूचना सामने आई है, जो हालात की गंभीरता को दर्शाती है। इस बीच, ईरान के पूर्व शाह रज़ा पहलवी ने जनता से अपील की है कि वे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से न डरें और अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से आवाज उठाते रहें।
कुल मिलाकर, ईरान आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ धार्मिक सत्ता, आर्थिक संकट और जनाकांक्षाओं के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया है। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि देश संवाद और सुधार की राह पकड़ता है या दमन और टकराव की।



