श्रद्धा के बिना भक्ति नहीं होती: आचार्य मृदुल जी
– श्रीमदभागवत कथा विश्राम दिवस
सुल्तानपुर ।
चांदा के प्रतापपुर कमैचा गांव में चल रही सप्त दिवसीय संगीतमय श्रीमद भागवत कथा ज्ञान महायज्ञ के विश्राम दिवस पर आचार्य साईं शंकर मृदुल जी महाराज ने भागवत भक्तो के समक्ष कहा कि सुदामा से परमात्मा ने मित्रता का धर्म निभाया। राजा के मित्र राजा होते हैं रंक नहीं, पर परमात्मा ने कहा कि मेरे भक्त जिसके पास प्रेम धन है वह निर्धन नहीं हो सकता। कृष्ण और सुदामा दो मित्र का मिलन ही नहीं जीव व ईश्वर तथा भक्त और भगवान का मिलन था।
श्रद्धालुजनों और मुख्य यजमान राकेश मिश्र क़ो कथा विस्तार से समझाते हुए भागवताचार्य ने आगे कहा कि कृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता आज कहां है। यही कारण है कि आज भी सच्ची मित्रता के लिए कृष्ण-सुदामा की मित्रता का उदाहरण दिया जाता है। द्वारपाल के मुख से पूछत दीनदयाल के धामा, बतावत आपन नाम सुदामा, सुनते ही द्वारिकाधीश नंगे पांव मित्र की अगवानी करने पहुंच गए। लोग समझ नहीं पाए कि आखिर सुदामा में क्या खासियत है कि भगवान खुद ही उनके स्वागत में दौड़ पड़े। श्रीकृष्ण ने स्वयं सिंहासन पर बैठाकर सुदामा के पांव पखारे। कृष्ण-सुदामा चरित्र प्रसंग पर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
उन्होंने आगे कहा कि श्रद्धा के बिना भक्ति नहीं होती तथा विशुद्ध हृदय में ही भागवत टिकती है। भगवान के चरित्रों का स्मरण, श्रवण करके उनके गुण, यश का कीर्तन, अर्चन, प्रणाम करना, अपने को भगवान का दास समझना, उनको सखा मानना तथा भगवान के चरणों में सर्वश्व समर्पण करके अपने अन्त:करण में प्रेमपूर्वक अनुसंधान करना ही भक्ति है।
श्रीकृष्ण को सत्य के नाम से पुकारा गया। जहां सत्य हो वहीं भगवान का जन्म होता है। भगवान के गुणगान श्रवण करने से तृष्णा समाप्त हो जाती है। परमात्मा जिज्ञासा का विषय है, परीक्षा का नहीं। इस मौके पर सभाजीत मिश्र, अरविन्द मिश्र, उमेश सिंह, साधु दुबे, लालता प्रसाद मिश्र, विजय तिवारी, हिमांशु की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।संगीतमयी कथा के मध्य अनुराग ठाकुर ने भजनो के मध्यम से श्रध्दालुओ को भाव विभोर कर दिया। तबले पर विमल तिवारी की संगत ने चार चांद लगा दिया। कथा प्रसगो के बीच बीच भजन की प्रस्तुतियों पर श्रोताभक्त भाव विभोर हो गये
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